Sanskrit Shlokas With Meaning About Knowledge & Learning

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Sanskrit Shlokas With Meaning About Knowledge & Learning

Best Sanskrit Shlokas On Knowledge And Learning

न चोर हार्यं न च राज हार्यं न भात्रू भाज्यं न च भारकारि!

व्ययं कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम!!


Na chora haaryam, na cha raja haaryam, na bhaatr bhaajyam, na bharakaari

Vyayam krute vardhat evam nityam vidhyadhanam sarvadhana pradhanam

Cannot be snatched away by theif, cannot be snatched away by king, Cannot be divided among brothers, 
Not heavy either. If spent daily, it always keeps growing. The wealth of knowledge is the precious of wealth of all.



ताराणां भूशणं चन्द्रॉ नारीणां भूशणं पति:!


प्रुथिव्या भूशणं राजा विद्या सर्वस्य भूशणं !!

Taaraa naam bhushanam chandro naareenaam bhushanam patihi |
pruthivyaa bhushanam raajaa vidyaa sarvasya bhushanam || 

Stars are moon's ornament. Husband is the ornament for a women

King is the ornament for earth. Knowledge is the ornament for everyone.



विद्वत्वं च न्रुपत्वं च नैव तुल्यम् कदाचन |


स्वदॆशे पॉज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पॉज्यते ||

Vidvatvam cha nrupatvam cha naiva tulyam kadaachana |
Swadeshe poojyatee raajaa vidvaan sarvatra poojyatee ||
Subhashitavali

Knowledge and Royalty cannot be weighed together.

King is worshiped in his own land where as a leaned man is worshiped everywhere.




विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रतं |

पात्रत्वाद्दनमाप्नॊति धनाद्धर्मम् तत: सुखं ||


Vidyaa dadaati vinayam vinayaadyaati patrataam |

paatratvaa dhanamaapnoti dhanaad dharmam tataha sukham || 


Hitopadesha 

Knowledge imparts modesty.Through humbleness comes eligibility
Once eligible comes wealth. Wealth can be utilized to perform good deeds (dharma). 
Good deeds lead to happiness.




विद्या नम नरस्य रूपामधिकम प्रच्हन्न गुप्तं धनं
विद्या भॊगकरी यश: सुखकारी विद्या गुरूणाम  गुरु: |

विद्या बन्धुजनॊ विदॆशगमनॆ विद्य परं दैवतं
विद्या रजसु पूज्यते नहि धनं विद्या विहीन: पशु: ||

vidyaa nama narasya roopa madhikam prachhanna guptam dhanam

vidyaa bhogakari yashaha sukakari vidyaa gurunaam guruhu

vidyaa bandhujano videshagamane vidya param daivatam

vidyaa rajasu poojyate nahi dhanam vidyaa viheenaha pashuhu || 

Neeti shataka

Knowledge is human's extra beauty. It's a hidden treasure. Through knowledge, one can enjoy different happiness. It brings success and also the guru of guru. During foreign visit, knowledge is our kin. Only knowledge is worshiped and not wealth. One who doesn't posses this knowledge is truly an animal.




नास्ति विद्यासमो बन्धुः नास्ति विद्यासमः सहृत् ।
नास्ति विद्यासमं वित्तम् नास्ति विद्यासमं सुखम् ॥
Naasti vidya samo bandhuhu, naasti vidya samah sahrut
Naasti vidya samam vittam naasti vidya samam sukham
There is no relative equivalent to knowledge, there is no friend equivalent to knowledge

There is no wealth equivalent to knowledge, there is no happiness equivalent to knowledge.




कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी ।
प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम् ॥
kaamdenu guna vidya hrakaale phaladya yini
pravaase maatrusa dshi vidya guptam dhana smrutam

Knowledge has characterisitc like "Kamadhenu" which grants all the wishes. During travel (journey), knowledge takes care like mother. Thus knowledge is considered as a hidden wealth.




क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥
अर्थ: एक-एक क्षण गँवाए बिना विद्या प्राप्त करना चाहिए; और एक-एक कण बचाकर धन इकट्ठा करना चाहिए. क्षण गँवाने वाले को विद्या प्राप्त नहीं होती, और कण नष्ट करने वाले को धन नहीं मिलता.



विद्या नाम नरस्य कीर्तिरतुला भाग्यक्षये चाश्रयो
धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा ।
सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम्
तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु ॥
अर्थ- विद्या अनुपम कीर्ति है; भाग्य का नाश होने पर वह आश्रय देती है, कामधेनु है, विरह में रति समान है, तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल-महिमा है, बगैर रत्न का आभूषण है; इसलिए अन्य सब विषयों को छोडकर विद्या का अधिकारी बन.




श्रियः प्रदुग्धे विपदो रुणद्धि यशांसि सूते मलिनं प्रमार्ष्टि ।
संस्कारशौचेन परं पुनीते शुद्धा हि वुद्धिः किल कामधेनुः ॥
अर्थ: विद्या सचमुच कामधेनु है, क्योंकि वह संपत्ति को दोहती है, विपत्ति को रोकती है, यश दिलाती है, मलिनता धो देती है, और संस्काररुप पावित्र्य द्वारा अन्य को पावन करती है.




हर्तृ र्न गोचरं याति दत्ता भवति विस्तृता ।
कल्पान्तेऽपि न या नश्येत् किमन्यद्विद्यया विना ॥
अर्थ: जो चोरों के नजर नहीं आती, देने से जिसका विस्तार होता है, प्रलय काल में भी जिसका विनाश नहीं होता, वह विद्या के अलावा कौन सा धन हो सकता है ?


ज्ञातिभि र्वण्टयते नैव चोरेणापि न नीयते ।
दाने नैव क्षयं याति विद्यारत्नं महाधनम् ॥
अर्थ: विद्यारुपी रत्न महान धन है, जिसका बंटवारा नहीं हो सकता, जिसे चोर चोरी नहीं कर सकते, और दान करने से जिसमें कमी नहीं आती.




विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥
अर्थ- विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन आता है, धन से धर्म होता है, और धर्म से सुख प्राप्त होता है.




कुत्र विधेयो यत्नः विद्याभ्यासे सदौषधे दाने ।
अवधीरणा क्व कार्या खलपरयोषित्परधनेषु ॥
अर्थ- यत्न कहाँ करना ? विद्याभ्यास, सदौषध और परोपकार में. अनादर कहाँ करना ? दुर्जन, परायी स्त्री और परधन में.




विद्याविनयोपेतो हरति न चेतांसि कस्य मनुजस्य ।
कांचनमणिसंयोगो नो जनयति कस्य लोचनानन्दम् ॥
अर्थ- विद्यावान और विनयी पुरुष किस मनुष्य का चित्त हरण नहीं करता ? सुवर्ण और मणि का संयोग किसकी आँखों को सुख नहीं देता ?




विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ।
कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम् ॥
अर्थ- कुरुप का रुप विद्या है, तपस्वी का रुप क्षमा, कोयल का रुप स्वर, और स्त्री का रुप पातिव्रत्य है.
रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवाः ।



विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥
अर्थ- कोई व्यक्ति यदि रुपवान है, जवान है, ऊँचे कुल में पैदा हुआ है, लेकिन यदि वह विद्याहीन है, तो वह सुगंधरहित केसुडे के फूल की तरह शोभा नहीं देता है.



माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः ।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥
अर्थ: जो माता-पिता अपने बालक को नहीं पढ़ाते हैं, वह माता शत्रु के समान है और पिता बैरी है; हँसों के बीच बगुले की तरह, ऐसा मनुष्य विद्वानों की सभा में शोभा नहीं देता.



अजरामरवत् प्राज्ञः विद्यामर्थं च साधयेत् ।
गृहीत एव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥
अर्थ- बुढापा और मृत्यु नहीं आनेवाले है, ऐसा समझकर मनुष्य को विद्या और धन प्राप्त करना चाहिए; पर मृत्यु ने हमारे बाल पकड़े हैं, यह समझकर धर्माचरण करना चाहिए.



विद्या शस्त्रं च शास्त्रं च द्वे विद्ये प्रतिपत्तये ।
आद्या हास्याय वृद्धत्वे द्वितीयाद्रियते सदा ॥
अर्थ: शस्त्रविद्या और शास्त्रविद्या – ये दो प्राप्त करने योग्य विद्या हैं. इनमें से पहली वृद्धावस्था में हास्यास्पद बनाती है, और दूसरी सदा आदर दिलाती है.



सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् ।
अहार्यत्वादनर्ध्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥
अर्थ: सब धनों में विद्यारुपी धन सर्वोत्तम है, क्योंकि इसे न तो छीना जा सकता है और न यह चोरी की जा सकती है. इसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती है और उसका न इसका कभी नाश होता है.



विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः ।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम्
विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः ॥

अर्थ: विद्या इन्सान का विशिष्ट रुप है, विद्या गुप्त धन है. वह भोग देनेवाली, यशदेने वाली, और सुखकारी है. विद्या गुरुओं की गुरु है, विदेश में विद्या बंधु है. विद्या बड़ी देवता है; राजाओं में विद्या की पूजा होती है, धन की नहीं. विद्याविहीन व्यक्ति पशु हीं है.



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